आदिवासी न हिंदू हैं न मुस्लिम, वे सिर्फ प्रकृति पूजक: गरुड़ साय मांडवी
पृथक ‘आदिवासी धर्म कोड’ की मांग तेज; जनगणना में मूल पहचान दर्ज कराने का आह्वान
बालोद (डौंडीलोहारा):
देशभर में शुरू हुई जातीय जनगणना के बीच आदिवासी युवा नेता गरुड़ साय मांडवी ने समाज की अस्मिता को लेकर बड़ा बयान दिया है। मांडवी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आदिवासी न हिंदू हैं, न मुस्लिम, न सिख और न ही ईसाई; वे केवल ‘आदिवासी’ हैं। उन्होंने समाज से अपील की है कि इतिहास और अस्तित्व की रक्षा के लिए जनगणना के दौरान स्वयं को ‘प्रकृति पूजक’ के रूप में ही दर्ज कराएं।
ऐतिहासिक पहचान की बहाली पर जोर
मांडवी ने ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए बताया कि साल 1871 से 1951 तक की जनगणना में आदिवासियों के लिए ‘ट्राइबल रिलिजन’ का अलग कॉलम मौजूद था। उन्होंने आरोप लगाया कि 1961 के बाद एक सोची-समझी रणनीति के तहत इसे हटाकर ‘अन्य’ की श्रेणी में डाल दिया गया। इससे आदिवासियों को विवश होकर अन्य धर्मों को चुनना पड़ता है, जो उनकी मूल पहचान के साथ खिलवाड़ है।
प्रकृति पूजा ही वास्तविक धर्म
आदिवासी संस्कृति की विशिष्टता बताते हुए उन्होंने कहा कि हमारा धर्म किसी लिखित ग्रंथ या साकार ईश्वर पर नहीं, बल्कि ‘जल, जंगल और जमीन’ की जीवंत पूजा पर टिका है। यह प्रचलित धर्मों की परिभाषा से पूरी तरह स्वतंत्र है। मांडवी ने कहा कि पृथक धर्म कोड न होने के कारण आदिवासियों की जनसांख्यिकीय पहचान धुंधली हो रही है, जिससे भविष्य की पीढ़ियों पर संकट मंडरा रहा है।

केंद्र सरकार की उदासीनता पर सवाल
झारखंड विधानसभा जैसे मंचों से पृथक धर्म कोड का प्रस्ताव पारित होने के बावजूद केंद्र की चुप्पी पर उन्होंने चिंता व्यक्त की। मांडवी ने युवाओं और बुजुर्गों से एकजुट होने का आग्रह करते हुए कहा कि जनगणना के दौरान किसी भी भ्रम में न आएं। अपनी जड़ों के प्रति यह जागरूकता ही समाज को वास्तविक संवैधानिक शक्ति दिलाएगी।
