नगर कुरूद में विराजित मां चंडी मंदिर में भक्तों की उमड़ने लगी है भीड़।


कुरूद (सजग प्रहरी)। नगर कुरूद में विराजित आराध्य देवी मां चंडी मंदिर में शारदीय क्वांर नवरात्र के प्रथम दिवस से ही आस्था का जन सैलाब उमड़ रहा है। सुबह से देर रात तक भक्तों सहित दर्शनार्थियों की उमड़ने लगी है भीड़।

माता के प्रति भक्तों की आस्था को देखते हुए वर्ष में दो बार नवरात्रि पर्व में जोत जलाया जाता है, किन्तु जंवारा क्वांर नवरात्रि में एक ही बार बोया जाता है। वर्षो से इस मंदिर का संरक्षण संचालन चंद्राकर बन्धुओ द्वारा किया जा रहा था, परंतु विवाद के चलते अब कलेक्टर के संरक्षण में प्रशासन द्वारा संचालित हो रहा है।
मोहन चंद्राकर
इस मंदिर में मां चंडी कब से विराजित है इसके इतिहास के बारे में कोई भी जानकर नहीं बता पा रहे हैं। जहां पर मां चंडी विराजित है उस स्थान पर चट्टान की कठोर परत है, इसके समीप ही स्वयंभू शिवलिंग जलेश्वर महादेव भूगर्भ से अवतरित है। किदवंती अनुसार जब कुलेश्वर महादेव राजिम के प्राचीन मंदिर में स्थित शिवजी जलहरी महादेव महानदी के बाढ़ में डूब जाते थे तब यहां भी कुरूद में स्थित शंकर जी का जलहरी में पानी अपने आप आ जाता था और यहां भी जलहरी डूब जाता था। जानकारों के मुताबिक इस मंदिर का प्रथम पुजारी बीरसिंह गोड़ बैगा था। मां चंडी का प्रथम पुजारी होने के कारण मां चंडी मंदिर से निकलने वाले जोत जंवारा को उनके मठ गांधी चौक में जाकर चढ़ाते हैं और उसके बाद पूजा पाठ कर आगे बढ़ते हैं तथा जलसन तालाब में विसर्जित करते हैं।
शेखर चंद्राकर
वरिष्ठ बुजुर्गों में किसान नेता शेखर चंद्राकर का कहना है कि जिस आधार स्तंभ में मां चंडी विराजित है उस स्तंभ को 07 फीट तक खोद कर देखा गया लेकिन कितनी गहराई में है यह भी पता नहीं लगा पाए। अभी वर्तमान में इस मंदिर में पुजारी जितेंद्र प्रसाद योगी हैं एवं मुख्य जजमान दाऊ मोहन चंद्राकर जी हैं। इस मंदिर में कन्या भोज कराने का रिवाज है, कुंवारी कन्याओं को देवी के रूप में विधि विधान से नौ कन्याओं का पैर धोकर चरण छूकर उन्हें श्रद्धा भक्ति के साथ चरण स्पर्श कर भेंट स्वरूप मां का सिंगार भेंट किया जाता है।
पत्रकार गोकुलेश सिन्हा की रिपोर्ट