रूमकेरा में सरपंच की दबंगई, एक परिवार का “हुका-पानी” बंद सहित सामाजिक बहिष्कार।
हक एवं न्याय की लड़ाई लड़ रहे पीड़ित परिवार के मानव अधिकार का हनन !
मानसिक प्रताड़ना एवं झूठे आरोपों का सामना कर रहे परिवार ने एसडीएम से लगाई न्याय की गुहार!
रायगढ़/ घरघोड़ा/सजग प्रहरी। ग्राम पंचायत रूमकेरा के सरपंच की दबंगई और तानाशाही रवैये ने लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। सरपंच ने एक परिवार को न केवल झूठे आरोपों में फंसाने की कोशिश की बल्कि खुलेआम गांव में मुनादी कराकर उनका ‘हुका-पानी बंद’ सहित सामाजिक बहिष्कार भी करवा दिया। इससे पीड़ित परिवार सामाजिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और आर्थिक संकट से भी गुजर रहा है तथा लगातार उनके मानव अधिकार का भी हनन किए जाने का आरोप है।

सामाजिक बहिष्कार का दंश झेल रहे पीड़ित परिवार द्वारा एसडीएम को दिए गए ज्ञापन में उल्लेख किया गया है कि सरपंच ग्राम पंचयत रूमकेरा के द्वारा उनके घर के सामने सामुदायिक भवन का निर्माण कार्य किया जा रहा है जिसके कारण उनके घर आने-जाने का रास्ता बंद हो जा रहा है, कहीं से भी रास्ता ना होने के कारण उनके द्वारा उक्त निर्माण के विरुद्ध हाई कोट से स्थगन आदेश ले आया। फलस्वरूप सरपंच के द्वारा उनके एवं परिवार के प्रति दुर्भावना रखा जाने लगा। वहीं सरपंच के द्वारा उनके विरूध थाने में पंप चोरी कि झूठी शिकायत किया गया है जिसके चलते पूरा परिवार मानसिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं।

उन्होंने बताया कि दिनांक 30/8/2025 को सरपंच के द्वारा गांव में हमारा हुका पानी बंद कर सामाजिक बहिष्कार कर दिया है तथा उनके द्वारा फरमान जारी किया गया है कि गांव का कोई भी व्यक्ति हमसे सबंध रखेगा तो उसके ऊपर 10000 रु. का जुर्मान लगाया जायेगा। अवगत हो कि सरपंच ने बकायदा मुनादी करवाकर फरमान जारी किया है जिसके कारण गांव का कोई भी आदमी हमसे बातचीत नहीं कर रहा है। परिणाम स्वरूप हमरा पूरा परिवार एकांकी जीवन जीने मजबूर है तथा लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं।

विदित हो कि सभ्य मानव समाज में इस तरह का ‘हुक्का-पानी बंद’ कर सामाजिक बहिष्कार थोपना न सिर्फ एक काला अध्याय है बल्कि संविधान और कानून दोनों के खिलाफ भी है। मामले में सवाल यह है कि जब लोकतांत्रिक व्यवस्था में आम नागरिक को अपने हक–अधिकार एवं न्याय के लिए आवाज उठाने का हक है, तो पंचायत स्तर पर इस तरह की अलोकतांत्रिक, तानाशाही की यह काली छाया आखिर कायम क्यों है? बहरहाल जहां लोकतंत्र की चौपाल सजनी चाहिए वहां आज भी सामंती फरमानों की गूंज सुनाई दे रही है।सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं है बल्कि सभ्य एवं जागरूक समाज में इंसाफ और इंसानियत की लाज का भी है।
