साहू समाज के कथित पांच ठेकेदारों को 6–6 माह का कारावास एवं अर्थदंड
सामाजिक बहिष्कार करने वाले 5 दोषियों को 6-6 माह की जेल, कोर्ट ने सुनाया कड़ा फैसला
बालोद। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के ग्राम सोंहपुर में दो परिवारों का सामाजिक बहिष्कार करना पांच लोगों को भारी पड़ गया। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) बालोद, श्री मान संजय सोनी की अदालत ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए पाँचों अभियुक्तों को 6-6 माह के साधारण कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाई है। पीड़ित परिवारों ने इस फैसले को सत्य की जीत बताया है।
क्या है पूरा मामला?
यह घटना कर्मा जयंती मनाने के लिए चंदा इकट्ठा करने से शुरू हुई थी। गाँव के भोलेश्वर सिंह साहू और सुरेश कुमार गंजीर ने प्रत्येक घर से 200 रुपये चंदा लेने का विरोध किया था। उनका सुझाव था कि समाज के पास पहले से जमा 20,000 रुपये का उपयोग सादगी से कार्यक्रम मनाने के लिए किया जाए। इस बात से नाराज होकर समाज के तत्कालीन अध्यक्ष मनोज कुमार गंगबेर और अन्य सदस्यों ने उसी रात दोनों परिवारों के ‘हुक्का-पानी’ बंद करने का फरमान जारी कर दिया।
अमानवीय प्रतिबंध और प्रताड़ना
पीड़ित परिवारों पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे, जिसमें ग्रामीणों से बातचीत करना, ट्रैक्टर से जुताई, मिल में कुटाई-पिसई और डेयरी से दूध खरीदने जैसे दैनिक कार्यों पर रोक शामिल थी। इतना ही नहीं, यह भी ऐलान किया गया था कि जो कोई इनसे बात करेगा उसे 1000 रुपये का दंड देना होगा और सूचना देने वाले को 500 रुपये का इनाम मिलेगा।
इन लोगों को हुई सजा
लगातार प्रताड़ना से दुखी होकर पीड़ितों ने 13 फरवरी 2019 को न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। लगभग 8 साल तक चले इस प्रकरण के बाद न्यायालय ने निम्नलिखित अभियुक्तों को दोषी पाया:
• मनोज कुमार गंगबेर (अध्यक्ष)
• बुधलाल गंगबेर
• हकीमचंद साहू
• कलेश्वर गंगबेर
• डिगेन्द्र कुमार गंगबेर (शिक्षक)
कानूनी धाराएं और दंड
न्यायालय ने सभी अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 500 के तहत 6 माह की जेल और 250 रुपये जुर्माना, तथा धारा 385/34 के तहत भी 6 माह की जेल और 250 रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई है। फैसले के बाद परिवादी पक्ष ने संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि उन्हें न्याय मिला है।
इस मामले से जुड़ी कुछ मुख्य बातें जो इस फैसले को महत्वपूर्ण बनाती हैं:
• सत्य की जीत: 8 साल के लंबे इंतजार के बाद, बालोद कोर्ट का यह फैसला समाज में व्याप्त ‘हुक्का-पानी बंद’ करने जैसी कुरीतियों पर एक कड़ा प्रहार है।
• अमानवीय प्रतिबंधों पर रोक: डेयरी से दूध न मिलने देना या बातचीत पर जुर्माना लगाना मानवाधिकारों का उल्लंघन माना गया।
• कानूनी जवाबदेही: सरकारी कर्मचारी (शिक्षक) समेत समाज के रसूखदार लोगों को सजा मिलना यह संदेश देता है कि कानून के सामने सब बराबर हैं।
